14 मई, 2026

स्वामीजी हमेशा हर किसी में अच्छाई देखते थे। कोई व्यक्ति कितना भी भटका हुआ क्यों न हो, क्रियानंद जी कभी किसी का आकलन  नहीं करते थे—वे केवल उनकी सर्वोच्च क्षमता को देखते थे। वे बिना मांगे शायद ही कभी कोई प्रत्यक्ष सलाह देते थे, लेकिन अक्सर ऐसा सूक्ष्म मार्गदर्शन देते थे जिसका महत्व समय के साथ प्रकट होता था।

मैं यहाँ ऐसी तीन कहानियाँ साझा करना चाहती हूँ जिनमें स्वामीजी ने मुझे सीधी और सरल सलाह दी, जिसने मेरे जीवन की दिशा ही बदल दी।

यह घटना तब की है जब मुझे आनंद संघ आए हुए केवल कुछ ही सप्ताह हुए थे। बचपन से ही मेरा झुकाव नृत्य के सभी रूपों—बैले, टैप और मॉडर्न डांस—की ओर था और मैंने कॉलेज तक नृत्य की कक्षाएं ली थीं। लेकिन जब मैं आनंदा आई, तो मेरे भीतर से किसी ने कहा कि अब नृत्य सीखने का समय समाप्त हो चुका है।

उन शुरुआती हफ्तों के दौरान, मैं स्वामीजी के नेतृत्व में होने वाले हठ योग के सत्रों में शामिल होती थी। नृत्य की पृष्ठभूमि होने के कारण, मुझे शरीर को खींचने और कठिन मुद्राओं में आने की आदत थी, इसलिए शारीरिक आसन मेरे लिए बहुत आसान थे। आध्यात्मिक शिक्षाओं में नई होने के कारण, मैं सोचने लगी, “हठ योग में ऐसा क्या खास है? यह तो बहुत सरल लगता है और आध्यात्मिक मार्ग के लिए बहुत प्रासंगिक (relevant) भी नहीं दिखता।”

उसी दौरान, मैं स्वामीजी की एक कक्षा में बैठी थी। मुझे विषय तो याद नहीं है, लेकिन एक मोड़ पर वे अपने मूल विषय से पूरी तरह हटकर बोले: “चूंकि कुछ लोग अधिक लचीले होते हैं, इसलिए वे योग के आसन आसानी से कर लेते हैं—लेकिन वे इन्हें केवल शारीरिक व्यायाम समझकर इसका असली उद्देश्य भूल जाते हैं। आसनों का लक्ष्य सूक्ष्म ऊर्जा (प्राण) के प्रवाह के प्रति सचेत होना, सकारात्मक अभिपूष्टियों (affirmations) के माध्यम से अपने मन को जागरूकता के उच्च केंद्रों की ओर ले जाना और खुद को ध्यान के लिए तैयार करना है।” इतना कहकर, वे वापस अपने मूल विषय पर लौट आए।

मुझे यह समझने में थोड़ा समय लगा कि वे सीधे मुझसे ही बात कर रहे थे, और मैं यह देख पाई कि मैं योग आसनों के आध्यात्मिक आयाम से कितनी अनभिज्ञ थी। उनका वह अप्रत्यक्ष मार्गदर्शन मेरे शेष जीवन के लिए एक संदर्भ बिंदु (reference point) बन गया: भले ही आपको लगे कि आप किसी चीज़ को समझते हैं, फिर भी उसमें और गहराई तक जाने का प्रयास करते रहें। जब कोई शिक्षा प्रबुद्ध गुरुओं से मिलती है, तो उसमें खोजने के लिए हमेशा कुछ न कुछ और बाकी रहता है।

दूसरी कहानी मेरे आनंद संघ आने के कुछ साल बाद की है। मैं अपनी एक सहेली के साथ कुछ काम निपटाने और दोपहर का भोजन करने पास के शहर नेवादा सिटी गई थी। जब हम रेस्तरां से बाहर निकल रहे थे, तभी स्वामी क्रियानंद जी कुछ शिष्यों के साथ अंदर आए।

मैं बिल्कुल तैयार नहीं थी जब वे मेरे पास आए और बोले, “मैं तुम्हें आध्यात्मिक नाम ‘देवी’ देने जा रहा हूँ। इसका अर्थ है दिव्य माँ  (divine mother)।” और अपनी आवाज़ में दृढ़ संकल्प के साथ उन्होंने आगे जोड़ा, “और तुम्हें इस नाम पर खरा उतरना होगा!” इतना कहकर, वे अपने शिष्यों के साथ बैठने के लिए एक मेज की ओर चले गए।

मैं पूरी तरह हैरान थी। मैंने उनसे कोई नाम नहीं मांगा था। मैं खुद को इतने महत्वपूर्ण नाम के योग्य नहीं मानती थी। फिर भी, जैसा कि मैंने कहा, स्वामीजी हममें से प्रत्येक के भीतर की सर्वोच्च क्षमता को देखते थे—और तब से यह नाम मेरे आध्यात्मिक विकास के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश बना हुआ है।

आखिरी कहानी जो मैं यहाँ साझा करूँगी, वह सलाह के उन पांच सरल शब्दों के बारे में है जो हमेशा मेरे साथ रहे हैं। यह घटना मेरे आनंद संघ आने के लगभग चार साल बाद की है, जब मैं मेडिटेशन (अब Seclusion ) रिट्रीट के कार्यालय में काम कर रही थी। रिट्रीट के उन शुरुआती दिनों में, हमारे पास बुकिंग लेने के लिए फोन तक नहीं थे, कंप्यूटर की तो बात ही छोड़ दीजिए। कभी-कभी मेहमान पहले से पत्र लिख देते थे, लेकिन अधिकांश बिना बताए ही आ जाते थे।

स्वामीजी हममें से प्रत्येक के भीतर के सर्वोच्च रूप को देखते थे

उस समय ठहरने के लिए केवल टेंट के चबूतरे (platforms) थे, इसलिए मेहमान या तो अपना टेंट लाते थे या खुले आसमान के नीचे डेरा डालते थे। जो लोग बिना तैयारी के आते थे, उन्हें देने के लिए हम एक स्टोर रूम में स्लीपिंग बैग और फोम पैड का स्टॉक रखते थे।

एक विशेष रूप से व्यस्त शुक्रवार की शाम को, मैंने अपने पास मौजूद हर एक स्लीपिंग बैग दे दिया था। जब मैं ऑफिस बंद कर रही थी, तभी मैंने एक कार के आने की आवाज़ सुनी। एक सज्जन बाहर निकले और बोले, “मैं यहाँ वीकेंड (सप्ताहांत) के लिए आया हूँ।”

मैंने पूछा, “क्या आपके पास स्लीपिंग बैग है?” उन्होंने जवाब दिया, “नहीं, मुझे नहीं पता था कि इसकी ज़रूरत पड़ेगी।”

मैंने उनसे एक पल रुकने को कहा, दौड़कर अपने छोटे से ट्रेलर (तंबू वाले घर) में गई, और अपना खुद का स्लीपिंग बैग और गद्दा उठा लाई। मैंने उन्हें सौंपते हुए कहा, “यह लीजिए।” उस रात मैं अपने ट्रेलर में बिना कुछ बिछाये लकड़ी के फर्श पर सोई और खुद को एक कोट से ढक लिया।

मैंने इस बारे में किसी से कुछ नहीं कहा। अगली सुबह, जब मैं स्वामीजी की कक्षा में शामिल होने के लिए मंदिर की ओर जा रही थी, वे मेरे पास आए और अपने चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान के साथ बोले, अब तुम्हें मार्ग समझ में आ रहा है ।” (Now you’re getting the idea.)

आनंद संघ में अपनी सेवा के वर्षों के दौरान मैंने कितनी ही बार उन शब्दों से प्रेरणा ली है: अपना सब कुछ बिना किसी झिझक के दे दो, भले ही वह तुम्हारे अपने खर्च या नुकसान पर ही क्यों न हो।

स्वामीजी का मार्गदर्शन मेरे आध्यात्मिक जीवन की नींव रहा है। हमें आत्मा की स्वतंत्रता का मार्ग इतनी बुद्धिमानी और प्रेम से दिखाने के लिए धन्यवाद, स्वामीजी।

ईश्वर और गुरु में आनंद और आशीर्वाद के साथ, 

नयास्वामी देवी

नयास्वामी देवी
नयास्वामी देवी पहली बार 1969 में आनंद के संस्थापक स्वामी क्रियानंद से मिलीं और उन्होंने अपना जीवन आध्यात्मिक पथ को समर्पित कर दिया। 1984 में, उन्होंने और उनके पति ज्योतिष ने आनंद संघ वर्ल्डवाइड के आध्यात्मिक निदेशक के रूप में एक साथ सेवा शुरू की। 2013 में क्रियानंदजी के देहांत के बाद से, ज्योतिष और देवी ने योगानंद द्वारा उन्हें सौंपे गए महान कार्य को आगे बढ़ाया है।
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