30 अप्रैल, 2026
स्वामी क्रियानंद जी के शताब्दी वर्ष में, हम उनके साथ बिताए अपने कुछ कुछ पल साझा कर रहे हैं—ताकि आप उन्हें और अच्छी तरह जान सकें, और साथ ही उन यादों को फिर से जीने का आनंद ले सकें, जिन्हें परमहंस योगानंद ने “स्मृति का सहज पुनरुत्थान” कहा है।
पहली घटना उस समय की है जब स्वामी जी काफी समय से आनंदा असीसी में रह रहे थे। हम उन्हें बहुत याद करने लगे थे, इसलिए हमने उनसे मिलने का निश्चय किया। दुर्भाग्यवश हमारा समय अनुकूल नहीं था—वे लेखन और शिक्षण में अत्यंत व्यस्त थे। यद्यपि वे सदैव विनम्र और स्नेही रहते थे, पर व्यक्तिगत रूप से समय बहुत कम दे पाते थे।
एक शाम, जब वे एक सार्वजनिक सत्संग के बाद मंदिर से बाहर जा रहे थे, उन्होंने मेरे चेहरे पर निराशा और पीड़ा देख ली। उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और गहरी दृष्टि से देखते हुए कहा, “देवी, मेरे लिए कोई भी विशेष नहीं है। मैं स्वयं भी अपने लिए विशेष नहीं हूँ।”
और फिर भी… परमहंस योगानंद जी अपनी Autpbiography of Yogi में लिखते हैं कि दिव्य दृष्टि “हर स्थान पर केंद्रित है, और उसकी सीमा कहीं नहीं।” स्वामीजी का जीवन, जो अपने गुरु की निरंतर सेवा और भक्ति में समर्पित था, इसी कारण हर जगह केंद्रित था। जो भी व्यक्ति सच्चे मन से उनके प्रति खुद को आध्यात्मिक रूप से खोलता है, वह उनकी दृष्टि से ओझल नहीं होते थे। उनका स्नेह व्यक्तिगत भावनाओं पर आधारित नहीं था, बल्कि गहरा और अडिग था—दिव्य प्रेम का जीवंत उदाहरण। वास्तव में, वे हममें से प्रत्येक को किसी न किसी रूप में यह अनुभव कराते थे कि हम उनके लिए विशेष हैं।उस यात्रा में मैंने पहले से कई अधिक गहराई से महसूस किया कि हम उनके लिए कितने महत्वपूर्ण थे—बाहरी संपर्क से नहीं, बल्कि आत्मिक संबंध के माध्यम से।
दूसरी घटना दिव्य प्रेम के एक और पहलू को दर्शाती है। यह आनंद संघ में मेरे शुरुआती वर्षों की बात है। उस समय मैं कई कठिनाइयों से गुजर रही थी और निराशा तथा भ्रम की स्थिति में थी। प्रतिदिन किसी एक का कार्य होता था स्वामी जी की डाक उनके घर, क्रिस्टल हर्मिटेज, तक पहुँचाना। एक दिन नियमित व्यक्ति किसी कारणवश नहीं जा सका और उसने मुझसे यह काम करने को कहा।
अपनी मानसिक स्थिति को देखते हुए मैं झिझक रही थी। उसने मुझे आश्वस्त किया, “चिंता मत करो, स्वामी जी लिखने में व्यस्त होंगे और तुम्हें देखेंगे भी नहीं। बस डाक मेज पर रखकर चुपचाप लौट आना।” मैंने सोचा, यह तो मैं कर ही सकती हूँ।
पर ऐसा नहीं हुआ। जैसे ही मैंने डाक रखी और जल्दी से मुड़कर जाने लगी, स्वामी जी—जो मौन होकर लिख रहे थे—स्वामीजी ने मुझे देख लिया। उन्होंने संकेत करके मुझे पास बुलाया और जिस कागज पर वे काम कर रहे थे उसे टाइपराइटर से निकाल दिया। (हां, स्वामीजी ने अपनी कई पुस्तकें कंप्यूटरों के आने से पहले के अंधकार युग में लिखी थीं।)
फिर एक नया कागज लगाकर उन्होंने केवल एक पंक्ति टाइप की:“पहले परमेश्वर के राज्य की खोज करो, और ये सब वस्तुएँ तुम्हें मिल जाएँगी।”
उन्होंने वह कागज मुझे थमा दिया और मुस्कराते हुए मुझे जाने का संकेत दिया। अपने गहन कार्य के बीच भी उन्होंने मेरे भीतर के संघर्ष को पहचान लिया और सहायता करने का समय निकाला। उस छोटे से प्रसंग ने मेरी ऊर्जा और दृष्टिकोण को बदल दिया, और मैं फिर से सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ सकी।
अंतिम घटना एक मित्र ने मुझे बताई। एक दिन जब मैंने उससे कहा कि स्वामी जी ने पिछली रात मुझे और ज्योतिष को फोन किया था, तो उसने आह भरते हुए कहा, “उन्होंने हमें कभी फोन नहीं किया।” फिर कुछ सोचकर बोली, “लेकिन एक बार किया था।”
उसने बताया, “एक रात मेरे पति और मेरे बीच बड़ा विवाद हुआ। हम दोनों अड़े रहे और बिना बात किए सो गए। अगली सुबह अचानक फोन बजा—और आश्चर्य की बात, वह स्वामी जी का था। उन्होंने केवल इतना कहा, ‘मैं आप दोनों के सुंदर भाव के लिए धन्यवाद देना चाहता हूँ।’ बस इतना ही।”
हम दोनों एक-दूसरे को देखने लगे, हमारी आँखों में आँसू आ गए, और सारा तनाव और कटुता पिघल गई। हम स्वामी जी के दिव्य प्रेम के वातावरण में एक-दूसरे को गले लगा बैठे।
योगानंद जी की कविता “समाधि” में वे लिखते हैं: “एक भी गौरैया(छोटी चिड़िया), रेत का हरएक दाना, मेरी दृष्टि से ओझल नहीं होता। मेरे मित्र, यह अनुभव स्वामी जी के देह त्याग के साथ समाप्त नहीं हुआ। जो भी सच्चे मन से उन्हें पुकारता है, उनके लिए उनकी उपस्थिति आज भी सुलभ है, क्योंकि वे अपने गुरु के सर्वव्यापी, शाश्वत प्रेम के माध्यम थे। हममें से प्रत्येक ईश्वर की दृष्टि में एक छोटी सी गौरैया है—और यही उनकी सबसे बड़ी कृपा है।
आनंद और कृतज्ञता के साथ,
नयास्वामी देवी