प्रारंभिक दिन
24 अप्रैल, 2026
मैं 26 अप्रैल 1967 को स्वामी क्रियानंद से अपनी पहली मुलाकात की 59वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा हूँ। यहाँ मैं उस यादगार दिन का वर्णन अपनी नवीनतम पुस्तक The Heart of Service की प्रस्तावना में इस प्रकार करता हूँ:
1967 की वसंत ऋतु के एक सुहावने ईस्टर रविवार ने मेरा जीवन हमेशा के लिए बदल दिया हालाँकि उस समय मुझे इसका एहसास नहीं था। दोपहर की शुरुआत में मैंने सैन फ्रांसिस्को में स्वामी क्रियानंद के छोटे से अपार्टमेंट के दरवाज़े पर दस्तक दी। जब हमने एक-दूसरे को अपना परिचय दिया, तो उन्होंने कहा, “मैं एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहा हूँ। क्या आप मदद करना चाहेंगे?”
“हाँ, बिल्कुल,” मैंने उत्तर दिया। ये तीन शब्द अंततः मेरे पूरे जीवन की दिशा बदलने वाले साबित हुए।
क्रियानंद जी परमहंस योगानंद जी की ध्यान तकनीकों पर आधारित आगामी कक्षाओं के लिए एक डाक (Mailing) तैयार कर रहे थे। पीछे मुड़कर देखने पर मुझे समझ आता है कि उनसे मिलने के पाँच मिनटों में ही मेरे जीवन के मुख्य विषय सामने आ गए थे: सेवा, ध्यान, और परमहंस योगानंद जी की शिक्षाएँ। यह एक संयोग नहीं था बल्कि ,यही इस पुस्तक के भी प्रमुख विषय हैं।
मैं स्वामी क्रियानंद जी से आनंद संघ की स्थापना से पहले मिला था और उनके साथ कार्य भी किया था। सोचा उन शुरुआती दिनों की कुछ घटनाएँ सुनना अच्छा लगेगा—जिनमें से हर एक कहानी स्वामीजी के अलग-अलग गुणों को दर्शाती है।
उस यादगार पहली मुलाकात के बाद, मैं जल्द ही उनके पाठ्यक्रमों में शामिल हो गया: एक घंटा हठ योग और उसके तुरंत बाद ध्यान का अभ्यास। क्योंकि यही एक तरीका था जिससे मुझे वह शिक्षाएँ मिल सकती थी जिसकी मैं तलाश कर रहा था, इसलिए मैं हर बार उपस्थित होता जब भी वे सैन फ्रांसिस्को में यह कोर्स आयोजित करते, जहाँ मैं उस समय रहता था। तीसरी बार जब मैंने यह कोर्स दोहराया, तो स्वामीजी ने देखा कि मेरी रुचि सामान्य से अधिक है। उन्होंने पूछा कि क्या मैं छात्रों का पंजीकरण जैसे छोटे कार्यों में उनकी मदद कर सकता हूँ। यह साधारण-सा अनुरोध स्वामीजी के एक महत्वपूर्ण गुण को दर्शाता है वे हमेशा लोगों को अपने कार्यों में शामिल करने के तरीके ढूंढते थे। यही विशेषता आनंद संघ के निर्माण की नींव बनी।
वह हमेशा लोगों को अपने काम में शामिल करने के तरीके ढूंढता रहता था।
मेरी पहली क्रिया दीक्षा 22 दिसंबर 1967 को हुई। मैं एक छोटा सा चमकीले पीले गुलदाउदी के फूलों का गुलदस्ता लेकर आया था, जिसे समारोह के दौरान वेदी पर भक्ति के प्रतीक के रूप में अर्पित किया जाना था। एक असावधान भक्त देर से आया और अपना फूल लाना भूल गया “था” तो उसने मेरे फूल उठा लिए, जो मैंने अपने पास फर्श पर रखे थे। इससे मेरे पास अर्पित करने के लिए कुछ नहीं बचा। यह आश्चर्यजनक रूप से मेरे लिए एक बड़ा आंतरिक परीक्षण बन गया: क्या मुझमें इतनी भी भक्ति नहीं थी कि गुरु मेरे फूलों का अर्पण स्वीकार करें? क्या मैं सच में उनका शिष्य हूँ?
अगले एक सप्ताह तक मैं इन प्रश्नों से व्याकुल रहा और मन की पीड़ा को शांत नहीं कर पाया। फिर स्वामीजी का फोन आया। उन्होंने पूछा, “क्या वह तुम थे जो उस समारोह में सुंदर पीले फूल लाए थे?”
“हाँ,” मैंने उत्तर दिया।
उन्होंने कहा, “वे अभी भी वेदी पर ताजे हैं। मैंने कभी फूलों को इतना लंबे समय तक ताजा नहीं देखा।”
स्वामी क्रियानंद, Seclusion Retreat’s Common Dome में, 1968
मेरा आंतरिक दुःख पूरी तरह समाप्त हो गया। इससे स्वामीजी की एक और विशेषता सामने आई जिसे उन्होंने बार -बार प्रदर्शित किया —लोगों के आंतरिक आध्यात्मिक द्वंद्व को समझने और उसे सुलझाने की उनकी अद्भुत क्षमता।
अंतिम कहानी आनंद संघ के निर्माण के प्रारंभिक प्रयासों से जुड़ी है। स्वामीजी ने मुझसे मिलने से तीन महीने पहले ही एक भूमि का हिस्सा प्राप्त किया था। मेरी सबसे सुखद यादों में वे यात्राएँ शामिल हैं, जब हम साथ मिलकर Seclusion Retreat गए और पहले ढाँचे सरल जियोडेसिक गुंबद बनाए। वह भूमि पूरी तरह अविकसित थी, कोई इमारत नहीं थी, और हम जमीन पर सोते थे।
हमारा पहला प्रयास एक छोटे मंदिर का गुंबद बनाने का था, लेकिन वह असफल रहा। अंतिम हिस्सा जोड़ने से पहले ही, जो उसे मजबूत बनता, वह झुकने लगा और फिर गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से टूटकर बिखर गया। शाम हो चुकी थी, और हमारे पास केवल साधारण भोजन करके तारों के नीचे सोने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।
स्वामीजी और मैं कुछ फीट की दूरी पर लेटे थे। अगली सुबह मैंने उन्हें धीरे-धीरे कुछ बुदबुदाते हुए सुना। मनोविज्ञान का अध्ययन करने के कारण, मैंने तुरंत “समझ लिया” कि वे अपनी निराशा को व्यक्त कर रहे हैं। हालाँकि मुझे पता था कि किसी की निजी बातों को सुनना ठीक नहीं है, लेकिन जिज्ञासा के कारण मैंने ध्यान से सुनना जारी रखा।
मैंने उन्हें धीरे-धीरे कहते सुना, “आह, आनंद। आह, आनंद।”
यह भी मेरे प्रारंभिक शिष्यत्व का एक महत्वपूर्ण अनुभव बन गया, जिसने स्वामीजी की एक और विशेषता को उजागर किया: वे जो कहते थे, वही जीते थे। उन्होंने शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारा।
वे शुरुआती दिन स्वामीजी की ऊर्जा और आनंद से भरे हुए थे, जो इतने वर्षों के बाद भी आनंद संघ के हृदय में जीवित हैं।
आनंद के साथ,
नयास्वामी ज्योतिष
नयास्वामी ज्योतिष
ज्योतिष और उनकी पत्नी, नयास्वामी देवी, Ananda Worldwide के आध्यात्मिक निदेशक के रूप में कार्यरत हैं। योगानंद के दीर्घकालिक भक्त, उन्होंने चालीस से भी अधिक वर्षों तक स्वामी क्रियानंद के साथ मिलकर काम किया और आनंद के विश्वव्यापी कार्य का मार्गदर्शन करने के लिए उनसे व्यक्तिगत रूप से प्रशिक्षित हुए। उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप, रूस और भारत में अध्यापन और व्याख्यान दिए हैं। ज्योतिष और देवी, दोनों ही क्रियाचार्य हैं, जिन्हें स्वामी क्रियानंद ने लोगों को क्रिया योग की पवित्र कला में दीक्षित करने के लिए नियुक्त किया है। 2013 में स्वामीजी के देहांत के बाद से, ज्योतिष उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकारी के रूप में कार्यरत हैं।
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